
सोचिए, अचानक बिजली चली जाए, इंटरनेट काम करना बंद कर दे, बैंकिंग ऐप न खुले और पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें लग जाएं। डिजिटल सेवाओं पर निर्भर आज की जिंदगी में ऐसी स्थिति किसी के लिए भी परेशानी खड़ी कर सकती है।
अक्टूबर 2026 में अमेरिका की सैन्य तैयारियों, ब्रिटेन की आपातकालीन सलाह, जापान में साइबर सुरक्षा की घटना, भारत में RBI के नए डेटा सेंटर और मध्य पूर्व में तेल की कीमतों से जुड़ी खबरें चर्चा में हैं। सोशल मीडिया पर कुछ लोग इन सभी घटनाओं को जोड़कर दावा कर रहे हैं कि दुनिया किसी बड़े डिजिटल या ऊर्जा संकट की ओर बढ़ रही है।
लेकिन क्या दुनिया भर में इंटरनेट बंद होने वाला है? क्या बैंकिंग सिस्टम पर ऐसा हमला होने जा रहा है जिससे लोगों के खाते ठप पड़ जाएंगे? इन सवालों का जवाब देने के लिए जरूरी है कि वास्तविक घटनाओं को अपुष्ट दावों से अलग करके देखा जाए।
ब्रिटेन की 72 घंटे वाली सलाह आखिर किसलिए है?
ब्रिटेन की सरकार ने 22 अक्टूबर 2026 को लोगों को आपात स्थिति के लिए तैयार रहने की सलाह दी। इसका सीधा मकसद यह है कि अगर बिजली, पानी, फोन या इंटरनेट जैसी सेवाएं कुछ समय के लिए बाधित हों, तो लोग अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी कर सकें।
तैयारी संबंधी गाइड में पीने का पानी, लंबे समय तक सुरक्षित रहने वाला खाना, टॉर्च, बैटरी वाला रेडियो, पावर बैंक और जरूरी दवाएं रखने जैसी बातें शामिल हैं। ऐसी चीजें खराब मौसम, बाढ़, बिजली की समस्या या संचार सेवाओं में रुकावट के दौरान भी काम आ सकती हैं।
इस सलाह को युद्ध की निश्चित घोषणा या दुनिया भर में इंटरनेट बंद होने का संकेत मानना सही नहीं होगा। आपातकालीन तैयारी का उद्देश्य किसी अनजान स्थिति में अचानक होने वाली परेशानी को कम करना है।
सोशल मीडिया पर यह दावा भी किया जा रहा है कि लोगों को नौ लीटर पानी जमा करना चाहिए और ब्रिटेन के पास युद्ध की तैयारी के लिए केवल 1,000 दिन बचे हैं। इन खास दावों की पुष्टि के लिए मूल सरकारी दस्तावेज या संबंधित अधिकारी का पूरा बयान देखना जरूरी है। सामान्य आपातकालीन सलाह अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं है कि किसी तय तारीख पर युद्ध होने वाला है।
अमेरिका के सैन्य अड्डों को 90 दिन तक आत्मनिर्भर बनाने की योजना?
अमेरिका के रक्षा मंत्रालय यानी पेंटागन से जुड़ी एक रिपोर्ट में FORTRESS नाम की पहल का उल्लेख है। रिपोर्ट के मुताबिक, इसका उद्देश्य संभावित बड़े संघर्ष के दौरान सैन्य अड्डों को बाहरी बिजली और सप्लाई में रुकावट आने पर भी काम करते रहने के लिए तैयार करना है।
आधुनिक सैन्य अड्डों को चलाने के लिए केवल सैनिक और हथियार ही काफी नहीं होते। बिजली, पानी, ईंधन, संचार नेटवर्क, कंप्यूटर सिस्टम और सामान की नियमित आपूर्ति भी जरूरी है। इनमें से किसी व्यवस्था में गंभीर रुकावट आए तो सैन्य गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं।
अमेरिका में छोटे परमाणु रिएक्टरों के जरिए सैन्य अड्डों को बिजली देने की योजनाओं पर भी रिपोर्टिंग हुई है। ऐसे रिएक्टर जरूरत पड़ने पर बिजली का वैकल्पिक स्रोत मुहैया करा सकते हैं।
हालांकि, सैन्य अड्डों की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने की योजना और सभी अड्डों पर 90 दिन तक बिजली, पानी तथा ईंधन की पूरी व्यवस्था तैयार होने का दावा एक ही बात नहीं है। इसी तरह, छोटे परमाणु रिएक्टरों की योजना को FORTRESS का हिस्सा बताने के लिए आधिकारिक पुष्टि जरूरी है।
अमेरिकी सैन्य तैयारियों की खबर पर ध्यान देना उचित है, लेकिन केवल इसके आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि दुनिया में जल्द ही युद्ध शुरू होने वाला है।
जापान में साइबर सुरक्षा की घटना: क्या ट्रेडिंग खातों पर खतरा बढ़ रहा है?
जापान की GMO Internet कंपनी से जुड़ा एक मामला डिजिटल सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाता है। कंपनी ने अपनी Onamae.com Desktop Cloud सेवा में अनधिकृत पहुंच की जानकारी दी। इसके बाद कुछ ग्राहकों के ट्रेडिंग खातों में ऐसे लेनदेन सामने आए, जिनके बारे में ग्राहकों ने कहा कि उन्होंने उन्हें खुद नहीं किया था।
यह मामला इसलिए अहम है क्योंकि कई कंपनियां और ग्राहक अपने डिजिटल कामकाज के लिए क्लाउड सेवाओं पर निर्भर हैं। किसी सर्वर में सुरक्षा की कमजोरी का फायदा उठाकर अनधिकृत पहुंच बनाई जाए, तो ग्राहकों की जानकारी और उनसे जुड़ी सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।
कंपनी ने घटना की जांच की और प्रभावित सिस्टम के नेटवर्क कनेक्शन बंद करने जैसे कदम उठाए। कंपनी के CEO मासातोशी कुमागाई ने भी साइबर सुरक्षा मजबूत करने और सरकार तथा निजी कंपनियों के बीच सहयोग की जरूरत पर बात की।
इस घटना के साथ एक और दावा फैलाया गया कि AI की मदद से हैकर्स ने 70 से ज्यादा ब्रोकरेज और फॉरेक्स प्लेटफॉर्म को हैक कर लिया। लेकिन कुछ ग्राहकों के खातों में संदिग्ध लेनदेन होना और दर्जनों कंपनियों के पूरे प्लेटफॉर्म का हैक हो जाना दो अलग बातें हैं। दोनों को एक जैसा बताने से पहले ठोस प्रमाण चाहिए।
इसी तरह, किसी हमले में AI का इस्तेमाल हुआ था या नहीं, यह तकनीकी जांच से तय होना चाहिए। साइबर अपराधी AI टूल्स का इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन हर साइबर हमले को AI से जोड़ देना सही नहीं है।
यह घटना डिजिटल सेवाओं की सुरक्षा को लेकर एक वास्तविक चेतावनी है। मगर किसी एक कंपनी से जुड़ी घटना का मतलब यह नहीं कि दुनिया भर का इंटरनेट बंद होने वाला है।
अमेरिकी बैंक AI एजेंट्स को लेकर सतर्क क्यों हैं?
AI एजेंट ऐसे डिजिटल टूल होते हैं जो उपयोगकर्ता के निर्देश पर कुछ काम खुद कर सकते हैं। वे जानकारी खोजने, किसी प्रक्रिया के चरण पूरे करने या दूसरे डिजिटल टूल्स के साथ काम करने में मदद कर सकते हैं।
लेकिन जब इन टूल्स को बैंक खातों या वित्तीय प्लेटफॉर्म तक पहुंच दी जाती है, तो सुरक्षा से जुड़े सवाल उठते हैं। क्या एजेंट केवल वही काम करेगा जिसकी उसे अनुमति है? क्या लॉगिन विवरण सुरक्षित रहेंगे? अगर वह गलत निर्देश समझ ले या कोई तीसरा व्यक्ति उसके जरिए पहुंच बना ले, तो नुकसान की जिम्मेदारी किसकी होगी?
अमेरिकी बैंकों में बाहरी AI एजेंट्स की पहुंच को लेकर चिंता की खबरें आई हैं। कुछ वित्तीय संस्थानों ने ऐसे टूल्स से जुड़े जोखिमों के मद्देनजर उनकी पहुंच सीमित करने के कदम उठाए हैं।
इसका यह मतलब नहीं है कि सभी अमेरिकी बैंकों के खाते हैक हो गए हैं या ग्राहकों का पैसा अपने आप निकलने लगा है। इसका मतलब है कि बैंक AI के बढ़ते इस्तेमाल के साथ सामने आ रहे नए जोखिमों को लेकर सतर्क हैं।
आम लोगों के लिए भी सावधानी जरूरी है। किसी अनजान AI टूल या वेबसाइट को बैंक का पासवर्ड, PIN या OTP न दें। किसी ऐप को वित्तीय जानकारी तक पहुंच देने से पहले उसकी विश्वसनीयता और मांगी गई अनुमतियों को अच्छी तरह समझ लें।
G7 की साइबर ड्रिल का मकसद क्या है?
G7 देशों के वित्तीय अधिकारियों ने AI से जुड़े साइबर हमलों की स्थिति में प्रतिक्रिया देने के लिए सिमुलेशन अभ्यास की योजना पर सहमति जताई है। ऐसे अभ्यास में यह देखा जा सकता है कि बड़े साइबर हमले के दौरान वित्त मंत्रालय, केंद्रीय बैंक और वित्तीय संस्थान किस तरह तालमेल बिठाएंगे।
इस तरह की ड्रिल का मकसद कमजोरियों का पता लगाना और संकट के समय प्रतिक्रिया देने की क्षमता बेहतर करना होता है। इसे किसी हमले की निश्चित भविष्यवाणी नहीं समझना चाहिए।
जैसे अस्पताल आग से बचाव का अभ्यास करते हैं और हवाई अड्डों पर सुरक्षा अभ्यास होते हैं, वैसे ही बैंक और सरकारें भी साइबर हमलों से निपटने की तैयारी करती हैं। AI के बढ़ते इस्तेमाल के साथ सुरक्षा की चुनौतियां बदल रही हैं, इसलिए ऐसी तैयारी सामान्य सुरक्षा प्रक्रिया का हिस्सा है।
भारत में RBI के नए डेटा सेंटर का क्या महत्व है?
भारत में डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन बैंकिंग का इस्तेमाल बढ़ने के साथ वित्तीय प्रणालियों को सुरक्षित रखना और भी जरूरी हो गया है। इसी संदर्भ में 25 अक्टूबर 2026 को भुवनेश्वर में भारतीय रिजर्व बैंक के नए डेटा सेंटर और साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण संस्थान का उद्घाटन किया गया।
प्रधानमंत्री कार्यालय के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अवसर पर बैंकिंग व्यवस्था को साइबर अपराधियों से सुरक्षित रखने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि किसी देश की अर्थव्यवस्था पर हमला करके भी उसे कमजोर किया जा सकता है।
आज बैंकिंग केवल शाखाओं, चेक और नकदी तक सीमित नहीं है। UPI, मोबाइल बैंकिंग, कार्ड से भुगतान, डिजिटल लेनदेन और वित्तीय संस्थानों के बीच डेटा का आदान-प्रदान रोजमर्रा की बैंकिंग का हिस्सा बन चुके हैं।
किसी बड़ी डिजिटल सेवा में तकनीकी खराबी आने पर लोगों को भुगतान करने, खाते की जानकारी देखने या दूसरे बैंकिंग काम पूरे करने में दिक्कत हो सकती है। साइबर हमले का खतरा होने पर कुछ सेवाओं को एहतियात के तौर पर सीमित भी किया जा सकता है।
नया डेटा सेंटर और साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण संस्थान इस डिजिटल ढांचे को मजबूत करने में मदद कर सकते हैं। लेकिन सुरक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए निवेश करना और किसी खास हमले की जानकारी होना अलग-अलग बातें हैं। इस परियोजना को आसन्न साइबर हमले का संकेत मानने का आधार नहीं है।
क्या पूरी दुनिया का इंटरनेट बंद होने वाला है?
सोशल मीडिया पर फैल रही सबसे बड़ी आशंकाओं में से एक यह है कि जल्द ही दुनिया भर में इंटरनेट बंद हो सकता है। लेकिन इस दावे के समर्थन में कोई विश्वसनीय वैश्विक सरकारी घोषणा या ठोस प्रमाण सामने नहीं आया है।
यहां तीन स्थितियों के बीच फर्क समझना जरूरी है। पहली, किसी देश या क्षेत्र में सरकारी आदेश से इंटरनेट बंद किया जाना। दूसरी, तकनीकी खराबी, साइबर हमले या नेटवर्क की समस्या के कारण कुछ सेवाओं का प्रभावित होना। तीसरी, पूरी दुनिया में इंटरनेट बंद हो जाना। तीसरा दावा कहीं ज्यादा व्यापक है और इसके लिए कहीं मजबूत प्रमाण चाहिए।
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में इंटरनेट शटडाउन हो चुके हैं। कुछ सरकारें सुरक्षा या कानून-व्यवस्था का हवाला देकर संचार सेवाएं सीमित करती हैं। तकनीकी खराबी या साइबर हमले के कारण भी वेबसाइट, क्लाउड सेवाएं और डिजिटल प्लेटफॉर्म कुछ समय के लिए बंद हो सकते हैं।
लेकिन ऐसी अलग-अलग घटनाओं को जोड़कर यह कहना कि पूरी दुनिया का इंटरनेट बंद होने वाला है, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है।
इंटरनेट किसी एक कंपनी या एक सर्वर पर निर्भर नहीं है। यह दुनिया भर के नेटवर्क, डेटा सेंटर, समुद्र के नीचे बिछी केबल, राउटर और सेवा प्रदाताओं से मिलकर बना ढांचा है। किसी एक कंपनी की सेवा ठप होने या किसी इलाके में इंटरनेट बाधित होने का मतलब यह नहीं कि पूरा वैश्विक नेटवर्क बंद हो जाएगा।
तेल की कीमतों में उछाल से चिंता क्यों बढ़ती है?
डिजिटल सुरक्षा के साथ ऊर्जा की उपलब्धता भी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अहम है। मध्य पूर्व में तनाव और समुद्री रास्तों पर रुकावट की आशंकाओं के बीच अक्टूबर 2026 में तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ने की खबरें आईं।
Reuters की रिपोर्टिंग के मुताबिक, ब्रेंट क्रूड 20 अक्टूबर को लगभग 108.79 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ था। इसके बाद 23 अक्टूबर को कीमत 116.72 डॉलर और 25 अक्टूबर की रिपोर्ट में 117.21 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई।
तेल की कीमतों में ऐसा बदलाव दिखाता है कि भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई को लेकर अनिश्चितता बाजार को प्रभावित कर सकती है।
तेल महंगा होने से आयात करने वाले देशों का खर्च बढ़ सकता है। परिवहन और उद्योग की लागत पर असर पड़ सकता है, जिसका दबाव कुछ वस्तुओं की कीमतों पर भी दिख सकता है। अगर सप्लाई में गंभीर रुकावट आए, तो सरकारें ईंधन बचाने या उसके वितरण को व्यवस्थित करने के उपाय कर सकती हैं।
फिर भी, तेल की कीमत बढ़ना और दुनिया में तेल पूरी तरह खत्म हो जाना अलग बातें हैं। बाजार में कीमतें मौजूदा सप्लाई के साथ-साथ भविष्य की आशंकाओं और भू-राजनीतिक जोखिमों से भी प्रभावित होती हैं।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और आगे अरब सागर से जोड़ता है। खाड़ी क्षेत्र से निकलने वाले तेल और गैस की बड़ी मात्रा इसी रास्ते से अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचती है।
अगर इस समुद्री मार्ग पर जहाजों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित होती है, तो तेल की सप्लाई में बाधा आ सकती है। जहाजों का बीमा महंगा हो सकता है, माल ढुलाई की लागत बढ़ सकती है और तेल आयात करने वाले देशों को ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है।
भारत जैसे तेल आयात करने वाले देश भी इससे प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि, असर कितना होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सप्लाई कितनी घटती है, रुकावट कितने समय तक रहती है और दूसरे स्रोतों से कितनी आपूर्ति मिल पाती है।
तेल संकट की आशंका को गंभीरता से लेना चाहिए, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि दुनिया में कोविड जैसा लॉकडाउन लगने वाला है। ऊर्जा संकट से निपटने के लिए उठाए जाने वाले कदम हर देश की जरूरतों और हालात के हिसाब से अलग हो सकते हैं।
श्रीलंका और बाली में ईंधन बचाने के उपाय
ईंधन की सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ने पर सरकारें कामकाज के तरीकों में बदलाव कर सकती हैं। श्रीलंका ने मार्च 2026 में सरकारी कार्यालयों के लिए हर बुधवार छुट्टी घोषित की थी। इसका मकसद मध्य पूर्व के संघर्ष से जुड़ी ईंधन आपूर्ति की अनिश्चितता के बीच खपत कम करना था।
इसी तरह, इंडोनेशिया के बाली प्रांत में 15 से 17 अक्टूबर 2026 तक तीन दिन के लिए वर्क फ्रॉम होम की व्यवस्था लागू की गई। प्रांतीय सरकार के मुताबिक, इससे ईंधन की सप्लाई और वितरण को सुचारु रखने में मदद मिल सकती थी।
बाली में पेट्रोल पंपों पर कतारें लगने और ईंधन वितरण में देरी की खबरें भी आईं। उपलब्ध रिपोर्टिंग में इन घटनाओं को स्थानीय सप्लाई की समस्या के तौर पर बताया गया, न कि दुनिया भर में तेल खत्म होने के सबूत के रूप में।
इन उदाहरणों से पता चलता है कि ईंधन की उपलब्धता को लेकर अनिश्चितता होने पर सरकारें खपत घटाने के कदम उठा सकती हैं। लेकिन ऐसे फैसलों को वैश्विक लॉकडाउन की शुरुआत कहना सही नहीं होगा।
बांग्लादेश के लालदिया पोर्ट समझौते का मामला
बांग्लादेश के लालदिया कंटेनर टर्मिनल की परियोजना भी चर्चा में है। इसके तहत डेनमार्क की APM Terminals और उसके स्थानीय साझेदार को टर्मिनल के विकास और संचालन से जुड़ी जिम्मेदारी दी गई है।
परियोजना के रिकॉर्ड के मुताबिक, नवंबर 2025 में 550 मिलियन डॉलर से अधिक के निवेश वाली डील हुई थी। इसके बाद 31 अगस्त 2026 को निर्माण कार्य शुरू होने की घोषणा की गई।
इस परियोजना से बांग्लादेश के चट्टोग्राम क्षेत्र में कंटेनर संभालने की क्षमता बढ़ने की उम्मीद है। कंपनी के अनुसार, टर्मिनल सालाना 800,000 TEU की अतिरिक्त क्षमता दे सकता है। TEU का मतलब 20 फुट के एक मानक कंटेनर के बराबर क्षमता है।
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि बंदरगाह का मालिकाना हक बांग्लादेश की Chittagong Port Authority के पास रहेगा। किसी निजी कंपनी को टर्मिनल विकसित करने और चलाने की भूमिका मिलना, बंदरगाह को किसी दूसरे देश को बेच देने के बराबर नहीं है।
इस परियोजना को क्षेत्रीय व्यापार और बंदरगाह की क्षमता के संदर्भ में देखना चाहिए। इसे किसी खास देश के प्रभाव को रोकने की रणनीति बताने के लिए अलग और ठोस प्रमाण जरूरी होंगे।
एलियन मदरशिप और इंटरनेट बंद करने की साजिश के दावे
कुछ दावों में कहा जा रहा है कि 2027 में एलियन मदरशिप आ सकती है, इंटरनेट बंद किया जा सकता है और सरकारें लोगों के बैंक खाते या संपत्ति जब्त कर सकती हैं।
इन दावों को लेकर सावधानी जरूरी है। इस पड़ताल में 2027 में एलियन मदरशिप आने या सरकारों द्वारा इंटरनेट बंद करके लोगों की संपत्ति जब्त करने की किसी विश्वसनीय आधिकारिक योजना का प्रमाण नहीं मिला।
AI से जुड़े साइबर हमले, डिजिटल भुगतान, स्टेबलकॉइन और सरकारी कर्ज वास्तविक विषय हैं। लेकिन अलग-अलग मुद्दों को एक साथ रखकर किसी गुप्त योजना का निष्कर्ष निकालना, बिना पर्याप्त सबूत के, ठीक नहीं है।
किसी वैज्ञानिक, कारोबारी या सरकारी अधिकारी का साइबर सुरक्षा को लेकर चिंता जताना भी इस बात का प्रमाण नहीं कि इंटरनेट बंद करने की योजना बन चुकी है। ऐसे दावों पर भरोसा करने से पहले मूल बयान, आधिकारिक दस्तावेज और विश्वसनीय रिपोर्टिंग देखनी चाहिए।
आम लोग अपनी सुरक्षा के लिए क्या कर सकते हैं?
वैश्विक संकट की आशंका से घबराने के बजाय कुछ व्यावहारिक कदम अपनाना बेहतर है:
- बैंक खाते का पासवर्ड, PIN और OTP किसी के साथ साझा न करें।
- अनजान लिंक पर क्लिक न करें और संदिग्ध ऐप को बैंकिंग जानकारी न दें।
- डिजिटल भुगतान न हो तो पहले बैंक के आधिकारिक ऐप या हेल्पलाइन से स्थिति जांचें।
- घर में जरूरत के हिसाब से पीने का पानी, लंबे समय तक सुरक्षित रहने वाला कुछ खाना, टॉर्च और जरूरी दवाएं रखें।
- फोन चार्ज रखें। जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल के लिए पावर बैंक भी रखा जा सकता है।
- साइबर हमले या इंटरनेट बंद होने से जुड़ा वायरल संदेश आगे भेजने से पहले आधिकारिक स्रोतों से जांचें।
- घबराहट में जरूरत से ज्यादा सामान खरीदने या बैंक से सारी नकदी निकालने जैसे कदम न उठाएं।
आपात स्थिति के लिए तैयारी करने का मतलब डर में जीना नहीं है। इसका मकसद बस इतना है कि किसी अप्रत्याशित रुकावट के दौरान बुनियादी जरूरतें पूरी करने में परेशानी कम हो।
जोखिम हैं, लेकिन वैश्विक डिजिटल लॉकडाउन का दावा साबित नहीं
अक्टूबर 2026 की खबरें बताती हैं कि साइबर सुरक्षा, ऊर्जा की सप्लाई और डिजिटल वित्तीय व्यवस्था को सुरक्षित रखना सरकारों और कंपनियों के लिए अहम है। ब्रिटेन ने नागरिकों को आपात स्थिति के लिए तैयार रहने की सलाह दी है। अमेरिका की सैन्य ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी पहल पर रिपोर्टिंग हुई है। जापान में GMO Internet से जुड़ी साइबर सुरक्षा घटना सामने आई है। G7 देशों ने AI से जुड़े साइबर हमलों से निपटने की तैयारी पर चर्चा की है और भारत में RBI का नया डेटा सेंटर तथा साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण संस्थान शुरू हुआ है।
लेकिन इन घटनाओं से यह साबित नहीं होता कि दुनिया भर में इंटरनेट जल्द बंद होने वाला है, बैंक खाते जब्त किए जाने वाले हैं या कोविड जैसा वैश्विक लॉकडाउन आने वाला है।
डिजिटल और ऊर्जा संकट के जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। साथ ही, अपुष्ट दावों को तथ्य की तरह पेश करना भी ठीक नहीं है। सबसे बेहतर तरीका है कि सामान्य सावधानियां बरती जाएं और डर फैलाने वाली भविष्यवाणियों पर भरोसा करने से पहले उनके प्रमाण जांचे जाएं।
