सर्बिया, ईरान, फ्रांस, स्पेन, पुर्तगाल, अल्बानिया और भारत से जुड़े प्रदर्शनों की कहानियों में मुद्दे अलग-अलग हैं, लेकिन इनके केंद्र में आम इंसान की जिंदगी है । कोई चाहता है कि उसकी मेहनत की कमाई में घर चल सके, कोई शिक्षा व्यवस्था में सुधार मांग रहा है और कोई ये जानना चाहता है कि सार्वजनिक फैसलों में उसकी आवाज कितनी अहम है

सर्बिया: एक हादसे ने खड़े कर दिए जवाबदेही के सवाल
सर्बिया में 1 नवंबर 2024 को नोवी साद रेलवे स्टेशन की शेड ढहने से 16 लोगों की मौत हो गई। इस हादसे ने देश में सार्वजनिक निर्माण, सुरक्षा और सरकारी जवाबदेही को लेकर गुस्से को तेज कर दिया । नवंबर 2024 में नोवी साद में 20,000 से ज्यादा लोगों ने प्रदर्शन किया । छात्रों ने आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाई । प्रदर्शनकारियों ने हादसे के समय से जुड़ी सुबह 11:52 बजे की घड़ी को विरोध का प्रतीक बनाया और हर शुक्रवार 15 मिनट तक यातायात रोककर अपनी मांगें सामने रखीं । 22 दिसंबर 2024 को बेलग्रेड के स्लाविया स्क्वायर पर बड़ा प्रदर्शन हुआ । जनवरी 2025 में भी विरोध जारी रहा । इसके बाद छात्र, किसान और वकील जैसे अलग- अलग समूह आंदोलन से जुड़े । 1 फरवरी 2025 को छात्रों और किसानों ने नोवी साद के तीन प्रमुख पुलों लिबर्टी, वराडिन और जेजेल पर नाकाबंदी की । लगातार बढ़ते विरोध प्रदर्शनों के बीच वुसिक ने सितंबर 2026 में मध्यावधि संसदीय चुनाव का रास्ता चुना । इस छात्र प्रदर्शनों ने सर्बिया की राजनीति का पूरा रंग ही बदल दिया….करीब दो साल से भ्रष्टाचार और सरकार की जवाबदेही के खिलाफ आंदोलन कर रहे छात्रों के समर्थन वाली ‘स्टूडेंट लिस्ट’ (Student List) ने संसदीय चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज की. जैसे ही चुनाव नतीजे सामने आए लोगों ने सड़कों पर उतर कर जमकर जश्न मनाया ।
ईरान: जब रोजमर्रा की खरीदारी भी चिंता बन जाए
28 दिसंबर 2025 को तेहरान के अलाउद्दीन शॉपिंग सेंटर और बाजार के व्यापारियों ने ईरानी मुद्रा रियाल की गिरावट के विरोध में दुकानें बंद करके प्रदर्शन शुरू किए । शुरुआत आर्थिक परेशानियों से हुई, लेकिन जल्द ही आंदोलन में राजनीतिक मांगें भी शामिल होने लगीं । दिसंबर 2025 के आखिरी दिनों में विरोध कई शहरों तक फैल गया। तेहरान विश्वविद्यालय के छात्रों ने आर्थिक मांगों के साथ राजनीतिक नारे भी लगाए । जनवरी 2026 में कुछ इलाकों में हिंसा के बाद इंटरनेट बंद किया गया और प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई की गई । ईरानी सुरक्षा बलों ने बेहद सख्ती से प्रदर्शन को कुचल दिया । मानवाधिकार संगठनों के अनुसार इस दौरान हज़ारों लोग प्रभावित हुए और कई लोगों को मौत की सजा भी दी गई । 8 से 16 जनवरी 2026 के बीच इंटरनेट ब्लैकआउट और 36,500 से अधिक लोगों की मौत का दावा किया गया। ईरानी सरकार की इस कड़ी कार्रवाई को अमेरिका और की साजिश बताया । फिलहाल ईरान में प्रदर्शन को तो दबा दिया गया लेकिन तेहरान में अमेरिका और वहां के राष्ट्रपति के खिलाफ अब भी प्रदर्शन हो रहे हैं
फ्रांस: स्कूल की क्लासरूम से शुरू हुआ विरोध
फ्रांस में सितंबर 2026 के दौरान पेरिस के उपनगर क्रेतेय में स्कूली छात्रों ने शिक्षकों की कमी के चलते प्रदर्शन की शुरुआत की । लेकिन अक्टूबर में ऑबर्विलियर्स में छात्रों और पुलिस के बीच झड़पों और महंगाई बढ़ने के बाद ट्रेड यूनियनों और कर्मचारियों के आंदोलन में शामिल होने से ये आंदोलन और बड़ा हो गया । फ्रांस के कई हिस्सों में लूट आगजनी की घटनाएं लगातार बढ़ने लगी । प्रदर्शनकारियों के कई सरकारी इमारतों को निशाना बनया । 24 अक्टूबर 2026 को हुए प्रदर्शन में करीब 8 लाख प्रदर्शनकारियों ने हिस्सा लिया । पूरे देश में करीब 70 हजार से ज्यादा पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया है । हालिया प्रदर्शनों में करीब 1000 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार भी किया गया है । लेकिन ये प्रदर्शन थमने का नाम नहीं ले रहा है
स्पेन: घर की तलाश क्यों बन रही है बड़ा सामाजिक सवाल?
स्पेन में जब एक 87 साल की बुजुर्ग मारिकार्मेन अबस्कल को उनके 70 साल पुराने किराए के घर से बेदखल किया गया तो स्पेन सरकार की खास वहां की जनता की नजरों में बुरी तरह गिर गई । 2 अक्टूबर 2026 को संसद में बेदखली-रोधी आवास कानून सरकार ने लाया पर वो उसे पास नहीं करवा पाई । पूरे यूरोप की तरह स्पेन भी हाउसिंग क्राइसिस चल रहा है और इसी वजह से शुरू हुआ प्रदर्शन पूरे स्पेन में फैल गया है । राजधानी मैड्रिड में सबसे बड़ा प्रदर्शन हुआ ‘टेनेंट्स यूनियन’ के अनुसार प्रदर्शनकारियों की संख्या 5 लाख थी, जबकि सरकारी अधिकारियों ने ये संख्या 70,000 बताई । प्रदर्शनकारियों ने कई दिनों तक शिवर लगाकर रखे । कई जगह प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुई जिसके बाद कुछ प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया । हालात ऐसे हो गए हैं की स्पेन के प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेस को तय समय से 8 महीने पहले ही आम चुनाव का ऐलान करना पड़ा है
अल्बानिया: भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच युवाओं की नाराजगी
अल्बानिया में प्रधानमंत्री एडी रामा की सरकार के खिलाफ विरोध को भ्रष्टाचार के आरोपों, शिक्षा की लागत और सरकारी व्यवस्था से जुड़ी शिकायतों के बाद प्रदर्शन शुरू हुआ जिसे ‘फ्लेमिंगो क्रांति’ कहा गया । राजधानी तिराना (Tirana) में हज़ारों छात्र प्रदर्शन में शामिल हुए । इसके अलावा ये प्रदर्शन एल्बासन और श्कोडरके विश्वविद्यालयों तक फैल गया । प्रदर्शनकारियों ने शिक्षा मंत्रालय की इमारत और दो बैंकों में आग लगा दी । इसके अलावा कूड़ेदान पलटे गए, दुकानों के शीशे तोड़े गए और पुलिस पर पत्थरबाजी की गई । पुलिस ने कुछ लोगों को हिरासत में लिया लेकिन लोगों में ये असंतोष गहराता ही जा रहा है
इटली और बेल्जियम: जीवन की लागत ने बढ़ाई बेचैनी
इटली में कम वेतन और बढ़ती जीवन लागत के खिलाफ मिलान, रोम, ट्यूरिन और नेपल्स में जबरदस्त प्रदर्शन हुए । मिलान में, दंगाइयों ने पुलिस के साथ झड़प हुई, दुकानों में लूटपाट की और शहर के बीच में सामान को आग लगा दी । इटली में शांति मार्च हुआ तो नकाबपोश बदमाशों ने पुलिस पर पथराव किया और आग लगा दी । पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस और वॉटर कैनन का इस्तेमाल किया । बेल्जियम में लोग सरकार की बजट कटौती, कम सैलरी और महंगे होते मकानों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। इसके साथ ही युवा और छात्र बेहतर शिक्षा व्यवस्था और पुलिस के व्यवहार के विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं । यहां के कई बड़े शहरों में हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं और लाखों लोग सड़कों पर उतरे हुए हैं
भारत में परीक्षा और चुनावी प्रक्रिया पर उठते सवाल
भारत में भारत में NEET-UG 2026 पेपर लीक को लेकर छात्रों का प्रदर्शन शुरू हुआ । 2 मई 2026 को पेपर लीक की पुष्टि हुई तो NEET के पेपर को रद्द किया गया । 16 मई 2026 को सोशल मीडिया पर परीक्षा व्यवस्था के खिलाफ छात्रों को एकजुट करने के लिए ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) का गठन हुआ, जो आगे चलकर आंदोलन का मुख्य चेहरा बनी । 6 जून 2026 को दिल्ली में सीजेपी और छात्रों ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर बड़ा जमीनी आंदोलन शुरू किया। 20 जून 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों का अनिश्चितकालीन धरना शुरू हुआ। जिसमें 28 जून 2026 को सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक शामिल हुए । 20 जुलाई 2026 को मानसून सत्र के पहले दिन हजारों छात्रों ने संसद भवन की तरफ मार्च किया। दिल्ली पुलिस ने भारी बैरिकेडिंग की, लाठीचार्ज हुआ और तीखी झड़पें हुईं। 23-24 जुलाई 2026 को विपक्ष के भारी हंगामे के बाद प्रदर्शन देश के कई राज्यों (उत्तर प्रदेश, बिहार, केरल, मध्य प्रदेश) में हिंसक हो गया। पुलिस को वाटर कैनन और लाठीचार्ज का इस्तेमाल करना पड़ा। 25 जुलाई 2026 को चौतरफा दबाव और इतिहास के इस सबसे बड़े छात्र आंदोलन के आगे झुकते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। लेकिन बवाल शुरू ही हुआ था भारत में जिस लोकतंत्र को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं उसपर ही सवाल उठने लगे हैं । भारत में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण और चुनावी प्रक्रिया को लेकर इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट ने खलबली मचा दी । मीडिया रिपोर्ट्स में यह खुलासा हुआ कि चुनाव आयोग के भीतर दो अन्य चुनाव आयुक्तों ने इस रिवीजन प्रक्रिया के कुछ फैसलों पर आंतरिक रूप से आपत्तियां दर्ज कराई थीं। इसके बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग पर “वोट चोरी” (Vote Chori) का आरोप लगाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग शुरू कर दी । 26 सितंबर 2026 को चुनाव आयोग ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस मसले पर सफाई दी । EC ने कहा कि आयोग के भीतर सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे और जिन आदेशों पर आंतरिक आपत्तियां थीं, उन्हें लागू नहीं किया गया था । 30 सितंबर 2026 को इंडिया ब्लॉक की एक मीटिंग हुई । जिसमें EC खिलाफ मोर्चा खोलने की रणनीति बनाई गई । 1 से 8 अक्टूबर 2026 तक ‘लोकतंत्र बचाओ’ अभियान चलाया। इस दौरान विभिन्न राज्यों के जिला मुख्यालयों पर धरने और प्रदर्शन आयोजित किए गए। इंडिया ब्लॉक के नेताओं और पुलिस के बीच कई बार झड़पें भी हुईं । 2 अक्टूबर 2026 और 6 अक्टूबर 2026 को विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने मार्च किया जिसके बाद कई नेताओं को हिरासत में ले लिया गया । 23 अक्टूबर 2026 को विभिन्न छात्र संगठनों (AISA, SFI, AISF), किसान संगठनों (SKM), नागरिक समाज और ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) ने मिलकर ‘द पीपुल्स मार्च टू रिक्लेम डेमोक्रेसी’ का आह्वान किया । जिसके बाद दिल्ली के गोल डाकखाना और बंगला साहिब गुरुद्वारे के पास हजारों प्रदर्शनकारी जुटे और चुनाव आयोग की तरफ बढ़ने की कोशिश की। धारा 163 लागू होने के कारण पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोका, जिसके बाद तीखी झड़पें हुईं और पुलिस ने 100 से अधिक कार्यकर्ताओं और छात्र नेताओं (जैसे नेहा बोरा, आयशे घोष) को हिरासत में ले लिया। देश भर में ये विरोध प्रदर्शन जारी हैं । विपक्षी दल 1 नवंबर 2026 को दिल्ली में एक बहुत बड़ी महारैली करने की तैयारी कर रहे हैं । दूसरी तरफ, चुनाव आयोग ने दिल्ली में दावों और आपत्तियों (Claims & Objections) को दर्ज कराने की अंतिम तारीख बढ़ाकर 30 अक्टूबर 2026 कर दी है ताकि छूटे हुए लोग अपना नाम जुड़वा सकें
आखिर इन आंदोलनों से क्या समझ आता है?
सड़कों पर उठने वाली आवाजों को केवल भीड़ की तस्वीर समझकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनके पीछे अक्सर ऐसी समस्याएं होती हैं, जिन्हें लोग अपने जीवन में महसूस करते हैं और जिनके समाधान की उम्मीद वे सार्वजनिक संस्थाओं से रखते हैं। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे विरोधों की असली कहानी इसी उम्मीद में छिपी है कि उनकी परेशानी सुनी जाए, फैसलों की जवाबदेही तय हो और बेहतर भविष्य की संभावना बनी रहे।
