मैं मुसलमान नहीं कश्मीरी पंडित हूँ: फारुख अब्दुल्ला

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मैं मुसलमान नहीं कश्मीरी पंडित हूँ: फारुख अब्दुल्ला

नई दिल्ली। कल एक कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय मंत्री फारुख अब्दुल्ला ने  सनसनी फैला दी। उन्होंने कहा कि "मैं मुसलमान नहीं, असल में कश्मीरी स

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नई दिल्ली। कल एक कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय मंत्री फारुख अब्दुल्ला ने  सनसनी फैला दी। उन्होंने कहा कि “मैं मुसलमान नहीं, असल में कश्मीरी सरस्वती पंडित हूं, जोकि वर्षों पहले कश्मीरी ब्राह्मण से मुसलमान बने थे। कश्मीरी मुसलमान दरअसल कश्मीरी पंडितों की ही उपज है। इसी के चलते आज भी मुझमे कश्मीरी पंडित की जुबां हैं।” यह बात केंद्रीय मंत्री फारुख अब्दुला ने प्रगति मैदान में आयोजित विश्व पुस्तक मेले में बुधवार को कश्मीरी भाषा में पहली बार प्रकाशित बच्चों की किताबों के विमोचन अवसर पर कही। 
बच्चों की इन पुस्तकों में चलचित्र एक महीने तक कश्मीरी रहन-सहन, वातावरण व पहनावे पर सर्वे के आधार पर तैयार किए हैं। हालांकि युवाओं पर आधारित अन्य 15 पुस्तकें जल्द ही मार्केट में होंगी, जिन्हें श्रीनगर में विमोचित किया जाएगा। फारुख अब्दुला के मुताबिक “आजादी के बाद दिल्ली हूकुमत को डर था कि कहीं कश्मीर भी हिन्दुस्तान से अलग न हो जाए। इसी डर के चलते दिग्गज राजनेताओं ने कश्मीर और कश्मीरी भाषा को आगे बढ़ने से रोकने के लिए उसे खामोश कर दिया। स्कूलों में कश्मीरी भाषा के विषय को पढ़ने पर रोक लगा दी गई। कश्मीरी बड़ी मुश्किल से शायरी व शादियों के गानों ने जिंदा रखी। हालांकि उन्होंने सत्ता में आने के बाद कश्मीरी भाषा के संरंक्षण के लिए कल्चरल एकेडमी गठित की, लेकिन वह राजनीति का शिकार हो गई।” 
फारुख अब्दुला ने बचपन की यादों को सांझा करते हुए कहा कि उनके घर में कश्मीरी बोलने का माहौल नहीं था, लेकिन उन्हें अपने नौकर के आने का इंतजार रहता था कि कहानियों के माध्यम से वे कश्मीरी से रूबरू हो सकें।उन्होंने दक्षिण भारतीय राज्यों का उदाहरण देते हुए कहा कि वे आज अपनी भाषा व परंपराओं के चलते अलग पहचान लिए हैं। इसी का अनुसरण हमारी युवा पीढ़ियों को भी करना होगा। फारुख अब्दुल्ला ने युवाओं से आह्वान किया कि वे कश्मीर में रहे या फिर दिल्ली या अमेरिका, अपनी भाषा व मिट्टी की महक व परंपराओं को सदैव याद रखना चाहिए। कार्यक्रम के अंत में विशेष रूप से आमंत्रित स्कूली बच्चों को फारुख ने मंच पर बुलाया। 
आज कश्मीरी परिवारों में बच्चों को कश्मीरी की बजाय अंग्रेजी बोलने पर बढ़ावा दिया जाता है। अपनी जुबां को गिराकर कोई भी आगे नहीं बढ़ सकता है। 
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