कॉलेज के दिनों की दोस्ती, आपसी दुश्मनी और चुनावी जीत-हार उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनकी चर्चा सिर्फ चुनाव, विधानसभा और राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रहती. इन नामों के साथ कभी छात्र राजनीति का दौर जुड़ता है, कभी अपराध की दुनिया में वर्चस्व की लड़ाई की कहानियां सामने आती हैं, तो कभी सत्ता के गलियारों में बदलते राजनीतिक समीकरणों की चर्चा होती है. पूर्वांचल की सियासत में धनंजय सिंह, अभय सिंह और बृजेश सिंह ऐसे ही तीन चर्चित नाम हैं
दिलचस्प बात ये है कि तीनों ने अलग-अलग रास्तों से राजनीति में अपनी जगह बनाई, लेकिन इनके नामों के साथ जुड़ी घटनाओं ने उत्तर प्रदेश की सियासत में बाहुबली नेताओं की भूमिका पर लगातार बहस भी पैदा की ।
आखिर कौन हैं धनंजय सिंह, अभय सिंह और बृजेश सिंह? इनका राजनीतिक सफर कैसे शुरू हुआ? किसकी कहानी में दोस्ती दुश्मनी में बदली और किसने जेल में रहते हुए चुनावी मैदान में अपनी किस्मत आजमाई? आइए, एक-एक करके समझते हैं ।
1. धनंजय सिंह: जौनपुर की राजनीति में कैसे बना बड़ा नाम?
पूर्वांचल की राजनीति में धनंजय सिंह का नाम लंबे समय से चर्चा में रहा है । जौनपुर के बनसफा गांव से निकलकर विधायक और सांसद तक का सफर तय करने वाले धनंजय सिंह की कहानी में छात्र राजनीति, आपराधिक मुकदमों और चुनावी राजनीति के कई अहम मोड़ आते हैं.
साधारण परिवार से शुरू हुआ सफर
धनंजय सिंह का जन्म 16 जुलाई 1975 को जौनपुर के बनसफा गांव में हुआ था. उनके पिता बैंक में काम करते थे । शुरुआती जीवन सामान्य पारिवारिक माहौल में बीता । उन्होंने जौनपुर के टीडी कॉलेज से पढ़ाई की और इसके बाद लखनऊ यूनिवर्सिटी पहुंचे। कॉलेज का दौर उनके जीवन में एक बड़ा बदलाव लेकर आया । साल 1991 में, जब उनकी उम्र करीब 15 साल थी, मारपीट से जुड़े एक मामले में उनका नाम आया और पहला मुकदमा दर्ज हुआ. इसके बाद लखनऊ यूनिवर्सिटी में उनकी पहचान छात्र राजनीति से जुड़ने लगी ।
एनकाउंटर में मृत घोषित होने की कहानी ने खींचा ध्यान
धनंजय सिंह की जिंदगी का एक ऐसा प्रसंग भी चर्चा में रहा, जिसने उन्हें राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में ला दिया। साल 1998 में पुलिस ने एक एनकाउंटर में उन्हें मृत घोषित कर दिया था । लेकिन करीब चार महीने बाद वो अदालत में जीवित पेश हुए। इस घटना के बाद उनकी कहानी को मीडिया में ‘द क्रिमिनल हू केम बैक फ्रॉम डेड’ जैसे नामों से भी चर्चा मिली।
निर्दलीय विधायक से सांसद तक का सफर
धनंजय सिंह ने साल 2002 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के जरिए अपनी औपचारिक राजनीतिक पारी शुरू की । उन्होंने जौनपुर की रारी विधानसभा सीट, जिसे अब मल्हनी कहा जाता है, से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की ।ये जीत उनके राजनीतिक सफर का बड़ा पड़ाव थी । इसके बाद साल 2009 में बहुजन समाज पार्टी (BSP) के टिकट पर उन्होंने जौनपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और सांसद चुने गए। इस तरह छात्र राजनीति से शुरू हुआ सफर विधानसभा और फिर संसद तक पहुंचा.
परिवार और निजी जिंदगी भी रही चर्चा में
धनंजय सिंह की निजी जिंदगी भी कई बार खबरों में रही है. उनकी पहली पत्नी मीनू सिंह का निधन हो गया था । दूसरी पत्नी डॉ. जागृति सिंह से उनका तलाक हुआ। साल 2017 में उन्होंने श्रीकला रेड्डी से शादी की. श्रीकला रेड्डी जौनपुर की जिला पंचायत अध्यक्ष हैं और एक बड़े कारोबारी-राजनीतिक परिवार से जुड़ी हैं ।
कानूनी मामलों ने भी बनाए रखी सुर्खियां
धनंजय सिंह के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, बलवा और रंगदारी समेत 40 से अधिक मुकदमे दर्ज होने की जानकारी दी गई है। साल 2024 में नमामि गंगे परियोजना के एक मैनेजर के अपहरण और रंगदारी से जुड़े मामले में MPMLA कोर्ट ने उन्हें 7 साल की सजा सुनाई थी। इसके बाद उन्हें हाईकोर्ट से जमानत मिली। ये मामला उनके राजनीतिक सफर का एक अहम कानूनी पड़ाव रहा।
2. अभय सिंह: लखनऊ यूनिवर्सिटी की दोस्ती से पूर्वांचल की राजनीति तक
अभय सिंह का नाम उत्तर प्रदेश की राजनीति में खास तौर पर इसलिए चर्चा में रहा है, क्योंकि उनका शुरुआती राजनीतिक और व्यक्तिगत सफर धनंजय सिंह से जुड़ा हुआ था। कभी दोनों को करीबी दोस्त बताया जाता था, लेकिन बाद में यही दोस्ती गहरी दुश्मनी में बदल गई.
जौनपुर में जन्म, लखनऊ में राजनीतिक पहचान
अभय सिंह का जन्म 24 मई 1974 को जौनपुर में भगवान बक्स सिंह के घर हुआ था। उनका मुख्य राजनीतिक प्रभाव अयोध्या (फैजाबाद) और लखनऊ के आसपास रहा। उन्होंने साल 1994 में लखनऊ यूनिवर्सिटी से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। उनके नाना राजकेशर सिंह जौनपुर से भाजपा सांसद रह चुके थे। इस वजह से परिवार की राजनीतिक पृष्ठभूमि भी उनके परिचय का हिस्सा रही।
धनंजय सिंह के साथ कभी थी गहरी दोस्ती
लखनऊ यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान धनंजय सिंह और अभय सिंह एक ही गुट में बताए जाते हैं। दोनों के बीच गहरी दोस्ती थी। दोनों की गतिविधियों और प्रभाव की चर्चा कॉलेज परिसर से लेकर जौनपुर तक होती थी। दोनों ने मिलकर जौनपुर में ‘छात्र कर्फ्यू’ तक लगाया था. हालांकि, समय के साथ ठेकेदारी, रेलवे टेंडर और राजनीतिक वर्चस्व को लेकर दोनों के बीच मतभेद बढ़ने लगे। यही मतभेद आगे चलकर एक बड़े विवाद में बदल गए।
टकसाल सिनेमा हॉल के सामने हुई घटना के बाद बदले रिश्ते
साल 2002 में वाराणसी के टकसाल सिनेमा हॉल के सामने धनंजय सिंह के काफिले पर जानलेवा हमले की घटना हुई। इस मामले में अभय सिंह को मुख्य आरोपी बनाया गया। इस घटना के बाद दोनों के बीच रिश्ते पूरी तरह बदल गए। जिस दोस्ती की शुरुआत विश्वविद्यालय के दिनों में हुई थी, वो आगे चलकर पूर्वांचल की राजनीति की चर्चित प्रतिद्वंद्विता में बदल गई।
समाजवादी पार्टी के टिकट पर बने विधायक
अभय सिंह ने साल 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में गोसाईगंज सीट से समाजवादी पार्टी (सपा) के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीतकर पहली बार विधायक बने। इसके बाद साल 2022 में भी उन्होंने इसी सीट से जीत दर्ज की । इस तरह उन्होंने अपनी राजनीतिक पकड़ को दोबारा साबित किया । फरवरी 2024 के राज्यसभा चुनाव के दौरान भाजपा के पक्ष में क्रॉस-वोटिंग करने के बाद जून 2025 में उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया । साल 2024 में उनकी पत्नी और पिता भाजपा में शामिल हुए थे, और समाजवादी पार्टी से निकाले जाने के बाद अक्टूबर 2026 को अभय सिंह औपचारिक रूप से भाजपा में शामिल हो गए हैं
गंभीर आपराधिक मुकदमों के कारण भी चर्चा
अभय सिंह के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, धोखाधड़ी और गैंगस्टर एक्ट समेत 10 से ज्यादा गंभीर मुकदमे दर्ज हैं, बुहजन समाजवादी पार्टी के शासनकाल में हुए सीएमओ विनोद आर्या हत्याकांड में भी उनका नाम सामने आया था। हालांकि, बाद में सीबीआई जांच में उनके खिलाफ सबूत नहीं मिले।
3. बृजेश सिंह: पूर्वांचल की राजनीति में अपराध से लेकर सदन तक का सफर
धनंजय सिंह और अभय सिंह की कहानी जहां दोस्ती और दुश्मनी के इर्द-गिर्द घूमती है, वहीं बृजेश सिंह का नाम पूर्वांचल में अपराध, राजनीतिक प्रभाव और पारिवारिक सियासी पकड़ के चलते चर्चा में रहा, वाराणसी के धौरहरा गांव से निकलकर विधान परिषद तक पहुंचने वाले बृजेश सिंह की कहानी भी दिलचस्प है।
जमींदार परिवार में हुआ जन्म
बृजेश सिंह का जन्म 1 जुलाई 1968 को वाराणसी के धौरहरा गांव में हुआ था । उनके पिता का नाम रवींद्र नाथ सिंह था। उनका परिवार क्षेत्र में राजनीतिक और सामाजिक रूप से प्रभावशाली रहा है। परिवार के कई सदस्य वाराणसी और चंदौली की राजनीति में सक्रिय रहे हैं उनकी पत्नी अन्नपूर्णा सिंह वाराणसी से MLC रही हैं। उनके भतीजे सुशील सिंह चंदौली की सैयदराजा विधानसभा सीट से भाजपा विधायक हैं।
पिता की हत्या के बाद बदली जिंदगी
बृजेश सिंह की जिंदगी का एक बड़ा मोड़ साल 1984 में आया, जब उनके पिता रवींद्र सिंह की गांव के कुछ विरोधियों ने हत्या कर दी। पिता की हत्या के बाद बृजेश सिंह का नाम बदले की घटनाओं और आपराधिक गतिविधियों से जुड़ने लगा. इसके बाद 1986 के सिकरौरा नरसंहार में 6 लोगों की हत्या की घटना ने पूरे पूर्वांचल का ध्यान खींचा । इन घटनाओं के बाद उनका नाम क्षेत्र में आपराधिक वर्चस्व और गैंगवार की चर्चाओं के साथ जुड़ गया ।
कोयला सिंडिकेट और ठेकों को लेकर भी चर्चा
बृजेश सिंह का नाम कोयला सिंडिकेट, रेलवे स्क्रैप और पूर्वांचल के ठेकों से जुड़े विवादों में भी सामने आता रहा । उनका नाम मुख्तार अंसारी गैंग के साथ लंबे समय तक चली प्रतिद्वंद्विता और गैंगवार की खबरों में भी चर्चा में रहा । साल 2001 का उसरी चट्टी कांड इस संघर्ष से जुड़ी प्रमुख घटनाओं में गिना जाता है। पूर्वांचल की राजनीति और अपराध के इतिहास को समझने वालों के लिए ये दौर काफी अहम माना जाता है। उस वक्त ठेकेदारी, स्थानीय प्रभाव और राजनीतिक ताकत के बीच टकराव की खबरें लगातार सामने आती थीं ।
जेल से चुनाव लड़ा, फिर बने MLC
बृजेश सिंह ने साल 2012 के विधानसभा चुनाव में जेल में रहते हुए राजनीतिक किस्मत आजमाई । उन्होंने चंदौली की सैयदराजा विधानसभा सीट से प्रगतिशील मानव समाज पार्टी (PMSP) के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन करीबी मुकाबले में हार गए । इसके बाद मार्च 2016 में उन्होंने जेल से ही वाराणसी स्थानीय निकाय सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर एमएलसी का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की । ये उनके राजनीतिक जीवन का एक बड़ा मोड़ था। विधानसभा चुनाव में हार के बाद विधान परिषद तक पहुंचने ने उनकी राजनीतिक स्थिति को एक नया आयाम दिया.
गिरफ्तारी से जमानत तक की कहानी
बृजेश सिंह के खिलाफ हत्या, अपहरण, गैंगस्टर एक्ट और मकोका समेत कई गंभीर मामलों में 30 से ज्यादा अपराधिक मामले दर्ज थे। लंबे वक्त तक फरार रहने के बाद साल 2008 में उन्हें ओडिशा के भुवनेश्वर से गिरफ्तार किया गया था । इसके बाद साल 2022 में इलाहाबाद हाईकोर्ट से जमानत मिलने पर वह जेल से बाहर आए ।
तीनों की कहानियों में क्या है सबसे बड़ा अंतर?
धनंजय सिंह, अभय सिंह और बृजेश सिंह की कहानियां कई जगह एक-दूसरे से मिलती हैं, लेकिन इनके राजनीतिक सफर के रास्ते अलग रहे हैं.
धनंजय सिंह ने छात्र राजनीति से शुरुआत की और निर्दलीय विधायक बनने के बाद बसपा के टिकट पर लोकसभा तक पहुंचे। अभय सिंह ने लखनऊ यूनिवर्सिटी के दौर से राजनीतिक पहचान बनाई। बाद में समाजवादी पार्टी के टिकट पर गोसाईगंज से विधायक बने और फिर उनकी राजनीतिक निष्ठा को लेकर बड़े बदलाव देखने को मिले । वहीं बृजेश सिंह ने जेल में रहते हुए चुनाव लड़ा. विधानसभा चुनाव हारने के बाद निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में विधान परिषद पहुंचे ।
पूर्वांचल की राजनीति में बाहुबली नेताओं का प्रभाव क्यों रहा है?
पूर्वांचल की राजनीति को समझने के लिए सिर्फ चुनावी आंकड़ों और राजनीतिक दलों को देखना पर्याप्त नहीं है । यहां स्थानीय स्तर पर प्रभाव, सामाजिक समीकरण, परिवारों की राजनीतिक भूमिका और ठेकेदारी जैसे मुद्दों की भी चर्चा होती रही है। कई बार ऐसे नेता चुनावी मैदान में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में उतरते हैं और जीत हासिल करते हैं । कुछ राजनीतिक दलों के टिकट पर सदन तक पहुंचते हैं, वहीं कुछ नेताओं की पहचान उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमों के कारण भी चर्चा में रहती है ।धनंजय सिंह, अभय सिंह और बृजेश सिंह की कहानियां इसी जटिल राजनीतिक तस्वीर को सामने रखती हैं। एक दौर में छात्र राजनीति से शुरू हुआ सफर आगे चलकर विधानसभा, लोकसभा और विधान परिषद तक पहुंचा। दोस्ती और दुश्मनी के रिश्ते बदले, राजनीतिक दल बदले और कानूनी लड़ाइयां भी जारी रहीं ।
इन तीनों के सफर को समझना दरअसल पूर्वांचल की राजनीति के उस दौर को समझना है, जहां स्थानीय प्रभाव, राजनीतिक महत्वाकांक्षा और कानून से जुड़े सवाल एक साथ दिखाई देते हैं।