आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के तटीय इलाके, जहां जिंदगी का बड़ा हिस्सा समुद्र, मछली पकड़ने और खेती पर निर्भर है वहां के लिए अगले कुछ दिन काफी अहम होने वाला है । बंगाल की खाड़ी में उठा चक्रवाती तूफान ‘मुरासु’ (Cyclone Murasu) अब भारत के पूर्वी और दक्षिणी तटीय इलाकों की ओर बढ़ रहा है । 2 नवंबर 2026 की सुबह तक ये भीषण चक्रवाती तूफान बन चुका है। इसके 2 नवंबर की आधी रात से 3 नवंबर की सुबह के बीच दक्षिणी आंध्र प्रदेश के तट से टकराने की आशंका है।

मुरासु तूफान का असर
इस दौरान हवा की रफ्तार 110 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच सकती है, जबकि झोंकों के साथ यह 120 किलोमीटर प्रति घंटे तक जा सकती है. आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना और ओडिशा समेत कई राज्यों में मौसम को लेकर अलर्ट जारी किया गया है।
अंडमान सागर से शुरू हुआ तूफान का सफर
चक्रवाती तूफान मुरासु अचानक नहीं बना । इसकी शुरुआत 29 अक्टूबर 2026 को अंडमान सागर के ऊपर एक कम दबाव वाले क्षेत्र (Low Pressure Area) के रूप में हुई थी। शुरुआत में ये सामान्य मौसमी सिस्टम जैसा था, लेकिन समुद्र के ऊपर आगे बढ़ते हुए इसकी ताकत लगातार बढ़ती गई । पश्चिम-उत्तर-पश्चिम दिशा में आगे बढ़ते हुए ये सिस्टम बंगाल की खाड़ी तक पहुंचा । 1 नवंबर को ये गहरे अवदाब (Deep Depression) में बदल गया । इसके बाद कुछ ही घंटों में इसकी तीव्रता बढ़ी और ये चक्रवाती तूफान मुरासु बन गया।
आखिर बंगाल की खाड़ी में बार-बार क्यों उठ रहे हैं तूफान?
इसकी एक बड़ी वजह समुद्र की सतह का तापमान है। अक्टूबर और नवंबर के दौरान बंगाल की खाड़ी में समुद्र की सतह का तापमान 28 डिग्री सेल्सियस से ज्याद बना रहता है । गर्म समुद्र से बड़ी मात्रा में नमी वातावरण में पहुंचती है। यही नमी चक्रवातों को ऊर्जा देने में मदद करती है।
वातावरण में हवाओं की स्थिति भी जरूरी
चक्रवात अर्नब के गुजरने के बाद बंगाल की खाड़ी के ऊपर कम दबाव का क्षेत्र पहले से मौजूद था । इसके साथ ही कम विंड शियर (Wind Shear) जैसी अनुकूल परिस्थितियों ने नए सिस्टम को मजबूत होने में मदद की । विंड शियर का मतलब है अलग-अलग ऊंचाइयों पर चलने वाली हवाओं की गति और दिशा में अंतर । जब ये अंतर कम होता है, तो चक्रवात को व्यवस्थित होने और मजबूत बनने के लिए अनुकूल माहौल मिल सकता है।
किसानों की बढ़ी चिंता, फसलों पर मंडरा रहा खतरा
चक्रवात का असर सिर्फ मौसम या यातायात तक सीमित नहीं रहता । इसका सबसे बड़ा आर्थिक नुकसान कई बार उन किसानों को उठाना पड़ता है, जिनकी महीनों की मेहनत खेतों में खड़ी होती है। आंध्र प्रदेश और आसपास के कृषि क्षेत्रों में धान और कपास की फसल को नुकसान पहुंचने की आशंका है।
मछुआरों को समुद्र से दूर रहने की सलाह
समुद्र में रहने वाले मछुआरों के लिए चक्रवात का समय सबसे ज्यादा सतर्कता बरतने वाला होता है। तेज हवाओं और समुद्र में ऊंची लहरों के कारण छोटी नावों के लिए समुद्र में जाना जोखिम भरा हो सकता है। प्रशासन ने मछुआरों को बुधवार यानी 4 नवंबर की सुबह तक समुद्र में नहीं जाने की सख्त हिदायत दी है।
ऐसे वक्त में क्या करें?
चक्रवात के दौरान मौसम तेजी से बदल सकता है, इसलिए प्रशासन और मौसम विभाग की तरफ से जारी निर्देशों को गंभीरता से लेना जरूरी है । मौसम विभाग और स्थानीय प्रशासन के अलर्ट पर नजर रखें ।समुद्र तटों और जलभराव वाले निचले इलाकों से दूर रहें। तेज हवाओं के दौरान खुले स्थानों और कमजोर इमारतों से बचें । बिजली के खंभों और गिरे हुए बिजली के तारों से दूरी बनाए रखें । प्रशासन की ओर से सुरक्षित स्थान पर जाने का निर्देश मिले तो उसका पालन करें । मछुआरे समुद्र में जाने से बचें और जारी प्रतिबंधों का पालन करें । किसानों को स्थानीय प्रशासन और कृषि विभाग की सलाह के अनुसार कदम उठाने चाहिए ।
कहां से आया ‘मुरासु’ नाम?
दिलचस्प बात ये है कि मुरासु नाम सुनने में भले ही अलग लगे, लेकिन इसका संबंध भारत की एक प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा से है । इस तूफान का नाम भारत ने दिया है । तमिल भाषा में ‘मुरासु’ का अर्थ युद्ध का प्राचीन ढोल या ड्रम होता है। पुराने समय में इस ढोल का इस्तेमाल गांवों में लोगों को प्राकृतिक आपदाओं और दूसरी बड़ी घटनाओं के बारे में चेतावनी देने के लिए भी किया जाता था । आज इसी नाम का चक्रवात समुद्र में उठकर कई राज्यों के लिए चिंता का कारण बन गया है ।
